Wednesday, July 12, 2006

आज दस सालों बाद भी ये ख्याल आता हैं

आज दस सालों बाद भी ये ख्याल आता हैं,
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं,

यूँ तो जुबां पे उनका नाम नहीं हैं
पर रह-रह के ये सवाल आता हैं
कि आख़िर क्यूँ उनका ख्याल आता हैं.

मुड़ गए वो तो एक मोड़ पे, जाने क्यूँ
ये याद हर साल आता हैं
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं.

कहते नहीं हम कुछ भी महफिल में
क्यूँकि जुबान पे सिर्फ़ दिल का हाल आता हैं
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं.



Sunday, August 08, 2004

तुम हो या नहीं, मुझे शायद पता नहीं

तुम हो या नहीं,
मुझे शायद पता नहीं.
पर ऐसा क्यूँ होता हैं,
आहट तेरे कदमों की
कानों तक आती हैं.
जो देखने को तुम्हें,
नजरे ऊठाता हूँ,
छिप कहीं जाती हो.

मेरी परछाई नहीं हो,
शायद कम भी नहीं हो.
मेरे साथ हो या, 
कहीं नहीं हो.

रास्तों पे जब अकेला,
मैं चलता हूँ, जाने क्यूँ,
साथ तुम भी चलती हो.
ऐसा क्यूँ लगता हैं कि
मैं जानता हूँ तुम्हें
फ़िर भी, अजनबी हो.

फ़ासले तो घटते हैं दो 
कदम आगे चलने पर,
क्यूँ तुम भी दो 
कदम बढ जाती हो.

जिन्दगी, तन्हा बिताने
का सोचा था, पर
ऐ तनहाई!! हर बार
क्यूँ आ जाती हो.

Wednesday, August 29, 2001

ऐ वक़्त जरा थम तो सही

ऐ वक़्त जरा थम तो सही,
तनिक रुक के ले दम तो सही.
क्या बतओगे तुम किस और रुख कर,
किस दिशा में जाओगे तुम.
मैं अकेला, ढुन्ढता एक साथी,
क्या साथ मेरा निभओगे तुम?
मैं भी हूँ एक राही,
चलना मेरी फ़ितरत हैं.
नहीं जानता मैं,
आगे कैसी किस्मत हैं.
फ़िर भी, न हो निरास बढ चला हूँ,

मैं छाछ फुक के पीता, दुध का जला हूँ.

Saturday, May 19, 2001

जंग के मैदान को देखा

जंग के मैदान को देखा, 
रक्तरंजित धरती देखी |


लाशों का ढ़ेर देखा, 
उनकी तन्हाई देखी |


ज़ख्म से बहते खून को देखा, 
खून से सनी मिट्टी देखी |


भयभीत चेहरों को देखा, 
दिल की खामोशी देखी |


नफरत और घृणा के आग को देखा, 
आग में झुलसे प्रेम को देखा |


सिपाहियों की सरफरोशी देखी, 
सन्नाटे की आगोशी देखी |


अपने भाइयों को मरते देखा, 
सीने के टुकड़े को लड़ते देखा |


जीत की ख़ुशी मानते देखा, 
हार के मातम को देखा |


जंग के मैदान को देखा, 
जंग के मैदान को देखा |

ये कविता मैंने २००१ या शायद २००२ में कभी लिखी थी | जो भाव इस कविता में नीहित हैं वो बीते हुए युगों में भी प्रासंगिक था, आज भी हैं और तब तक रहेगा जब तक जंग होते रहेंगे |
धन्यवाद

कभी रगों के लहू से टपकी

कभी रगों के लहू से टपकी, तो कभी बदन के पसीने से। कभी थरथराते होटों से, तो कभी धधकते सीने से।  टपकी है हर बार, आजादी, यहाँ घुट-घुट के जीने स...