Tuesday, December 02, 2008

हे जवानी जागो

हे जवानी जागो !!!

रण में रण-घोष हुआ है
आज रगों में जोश हुआ है
है पुकार रहा वतन तुमको
हे जवानी जागो !!!

बहुत हो चुका अब नहीं
खून है अपना, पानी नहीं
रीसने दे कैसे इस तन को
हे जवानी जागो !!!

गर दम नहीं है तन में
ठंडा पड़ा जोश मन में
हम है यहाँ, छोड़ो तुम गद्दी को
हे जवानी जागो !!!

भ्रष्ट हुआ है सोच तुम्हारा
नहीं भ्रष्ट है ज़मीर हमारा
तील-तील नहीं मरने देंगे जन को
हे जवानी जागो !!!



Sunday, August 17, 2008

रात का आलिंगन कर, जब आई एक नई सुबह

रात का आलिंगन कर
जब आई एक नई सुबह |

हर ओर उजाला फैलाती ,
लेकर किरण आई एक नई सुबह |

अचानक ही चहकने लगा जीवन
सुर में गाती आई एक नई सुबह |

डर और विस्मय को दे विराम
रगों में ऊर्जा भरने आई एक नई सुबह |

रुके हुए थे जो कदम, नई राह
को लेकर आई एक नई सुबह |

बढता जा रे पथिक, अविरत
तुझे लेने आई एक नई सुबह |

Thursday, August 14, 2008

जहान्वी, मैं आज तुम्हारी नजरों से देख रहा हूँ

आज, मैं तुम्हारी नजरों से, दुनिया देख रहा हूँ

ग़म कैसा, कुछ नहीं से,
बहुत कुछ देख रहा हूँ.
कल तक बढ़ता ही जा रहा था
जिंदगी में, आज थम के देख रहा हूँ.
खुशियों की मुस्कान तो देखी नहीं, पर हाँ,
आज ग़म की आँसुओं को देख रहा हूँ.
जहान्वी, मैं आज तुम्हारी नजरों से देख रहा हूँ

बदलते इंसानी फितरत को
अपने जेहन में देख रहा हूँ
अपनों से बेगाने होते लोगों को
अपने आँगन में देख रहा हूँ.
अपनाया किसे नहीं मैंने अपना कह के,
और वक्त पे मुकरते हुए अपनों को देख रहा हूँ.
जहान्वी, मैं आज तुम्हारी नजरों से देख रहा हूँ

ठहरे हुए पानी में उठते हुए
हलचल को देख रहा हूँ.
जगती आंखों से, सोते हुए
पल को देख रहा हूँ.
लिपटे हुए कफ़न में
जिन्दा हसरतो को देख रहा हूँ.
जहान्वी, मैं आज तुम्हारी नजरों से देख रहा हूँ

Monday, June 16, 2008

देखता हूँ जब भी दुनिया को, ख़ुद को खड़ा पाता हूँ

देखता हूँ जब भी दुनिया को,
ख़ुद को खड़ा पाता हूँ.

दौड़ते भागते लोगों के बीच
पता नहीं, ख़ुद को कहाँ पाता हूँ?

हर रास्ते की हैं एक मंजिल, जानता हूँ
फिरभी ख़ुद को चौराहे पर, खड़ा पाता हूँ.

अपनों के बीच भी
ख़ुद को तनहा पाता हूँ.

सिफारिश करूँ अपनी खुशियों की
किससे, नहीं वो खुदा पाता हूँ.

बढ़ रहा हूँ मंजिल की ओर,
पर किधर, नहीं वो रास्ता पाता हूँ.

Saturday, June 07, 2008

दूर तक जाते रास्तों पर

दूर तक जाते रास्तों पर
मैं दूर तक चला.
मिले पड़ाव कई मगर
ठिकाना एक न मिला.

बस अब नहीं, हर बार यह
सोच, एक कदम और चला.
जब मुड़ के देखा तब दिखा,
कि मैं तो मीलों चला.

अब रुकना व्यर्थ हैं
पर लगता चलना भला.
न हैं ठिकाना तो क्या
एक पड़ाव तो हर बार मिला.

थोडा रुक लिया, थोडा थम लिया
फिर नए जोश से आगे को चला
पथ दिखें कई, कई बार नहीं
विश्वास दृढ कर हर बार चला

ठेस लगी, गीरा भी कभी
दर्द हुआ, सब सहता चला
काँटों के शर मिले, पर
फूलों का सेज भी मिला

यात्रा का आनंद इसमें सुख-दुःख
धुप-छाव संग, मैं चला.
कह गए है बुजुर्ग, जो
अंत भला तो सब भला.

Sunday, December 03, 2006

जहान्वी, तुम कहाँ हो?

देव-नदी की चंचलता लिए
समेटे हिम-तुषार की निर्मलता
बहती तुम निर्भय हो
कल-कल छल-छल चली आती हो.
जहान्वी, तुम कहाँ हो?

मदमस्त हो झूमता हैं
जिसकी गोद में पवन .
हो के बेफिक्र
प्रवाहित होती हैं
जिसकी रगों में, ऐसी तुम हो.
जहान्वी, तुम कहाँ हो?

भाषा तो अनेकों हैं अधरों पे
पर तुम्हारी बोली हैं प्रेम की
ह्रदय विशाल हैं सागर सा
जिससे अमृत-रस छलकती रहती हो.
जहान्वी, तुम कहाँ हो?

पाप-पुन्य का भेद कैसा
ऊँच-नीच का भावः कहाँ
समेटे जग को अपने आँचल में
एक मधुर मुस्कान लिए,
चली आती हो.

जहान्वी, तुम कहाँ हो?

Wednesday, September 13, 2006

रोते हैं हम, लेकिन सिसकियाँ दबा लेते हैं

रोते हैं हम, लेकिन 
सिसकियाँ दबा लेते हैं
एक हलकी मुस्कान 
होटों पे सजा लेते हैं |
दिल का दर्द, हम कहें किससे  
खुद को ही समझा लेते हैं |
उठते इस तूफान को दिल में समेटे हुए 
खुद ही जलजले का मज़ा लेते हैं |

Wednesday, July 12, 2006

आज दस सालों बाद भी ये ख्याल आता हैं

आज दस सालों बाद भी ये ख्याल आता हैं,
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं,

यूँ तो जुबां पे उनका नाम नहीं हैं
पर रह-रह के ये सवाल आता हैं
कि आख़िर क्यूँ उनका ख्याल आता हैं.

मुड़ गए वो तो एक मोड़ पे, जाने क्यूँ
ये याद हर साल आता हैं
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं.

कहते नहीं हम कुछ भी महफिल में
क्यूँकि जुबान पे सिर्फ़ दिल का हाल आता हैं
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं.



Sunday, August 08, 2004

तुम हो या नहीं, मुझे शायद पता नहीं

तुम हो या नहीं,
मुझे शायद पता नहीं.
पर ऐसा क्यूँ होता हैं,
आहट तेरे कदमों की
कानों तक आती हैं.
जो देखने को तुम्हें,
नजरे ऊठाता हूँ,
छिप कहीं जाती हो.

मेरी परछाई नहीं हो,
शायद कम भी नहीं हो.
मेरे साथ हो या, 
कहीं नहीं हो.

रास्तों पे जब अकेला,
मैं चलता हूँ, जाने क्यूँ,
साथ तुम भी चलती हो.
ऐसा क्यूँ लगता हैं कि
मैं जानता हूँ तुम्हें
फ़िर भी, अजनबी हो.

फ़ासले तो घटते हैं दो 
कदम आगे चलने पर,
क्यूँ तुम भी दो 
कदम बढ जाती हो.

जिन्दगी, तन्हा बिताने
का सोचा था, पर
ऐ तनहाई!! हर बार
क्यूँ आ जाती हो.

Wednesday, August 29, 2001

ऐ वक़्त जरा थम तो सही

 वक़्त जरा थम तो सही,
तनिक रुक के ले दम तो सही.
क्या बतओगे तुम किस और रुख कर,
किस दिशा में जाओगे तुम.
मैं अकेला, ढुन्ढता एक साथी,
क्या साथ मेरा निभओगे तुम?
मैं भी हूँ एक राही,
चलना मेरी फ़ितरत हैं.
नहीं जानता मैं,
आगे कैसी किस्मत हैं.
फ़िर भी, न हो निरास बढ चला हूँ,

मैं छाछ फुक के पीता, दुध का जला हूँ.

Saturday, May 19, 2001

जंग के मैदान को देखा

जंग के मैदान को देखा, 
रक्तरंजित धरती देखी |


लाशों का ढ़ेर देखा, 
उनकी तन्हाई देखी |


ज़ख्म से बहते खून को देखा, 
खून से सनी मिट्टी देखी |


भयभीत चेहरों को देखा, 
दिल की खामोशी देखी |


नफरत और घृणा के आग को देखा, 
आग में झुलसे प्रेम को देखा |


सिपाहियों की सरफरोशी देखी, 
सन्नाटे की आगोशी देखी |


अपने भाइयों को मरते देखा, 
सीने के टुकड़े को लड़ते देखा |


जीत की ख़ुशी मानते देखा, 
हार के मातम को देखा |


जंग के मैदान को देखा, 
जंग के मैदान को देखा |

ये कविता मैंने २००१ या शायद २००२ में कभी लिखी थी | जो भाव इस कविता में नीहित हैं वो बीते हुए युगों में भी प्रासंगिक था, आज भी हैं और तब तक रहेगा जब तक जंग होते रहेंगे |
धन्यवाद

कभी रगों के लहू से टपकी

कभी रगों के लहू से टपकी, तो कभी बदन के पसीने से। कभी थरथराते होटों से, तो कभी धधकते सीने से।  टपकी है हर बार, आजादी, यहाँ घुट-घुट के जीने स...