यह ख़ता हैं ख़ुदा की
या सज़ा हैं चाँद की
कि अकेला हैं
तारों के साथ भी,
और
तारों के बाद भी
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कभी रगों के लहू से टपकी
कभी रगों के लहू से टपकी, तो कभी बदन के पसीने से। कभी थरथराते होटों से, तो कभी धधकते सीने से। टपकी है हर बार, आजादी, यहाँ घुट-घुट के जीने स...
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ख्वाबों के पंख इस जहाँ, उस जहाँ के होते| उड़ान उसकी बेपरवाह, आसमां के होते| उड़ जाऊं मैं, हवाओं में, ख्वाब-पंख फेलाए चिड़िया सी| हजा...
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कभी रगों के लहू से टपकी, तो कभी बदन के पसीने से। कभी थरथराते होटों से, तो कभी धधकते सीने से। टपकी है हर बार, आजादी, यहाँ घुट-घुट के जीने स...
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हतास भी नहीं थे निराश भी नहीं थे लेकिन जिंदगी के पास भी नहीं थे तृप्त भी नहीं थे प्यास भी नहीं थे सपने कुछ खास भी नहीं ...
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