हैं शब्दों से कुछ हासिल, यहीं कहता हैं मेरा-दिल कि ...
यह ख़ता हैं ख़ुदा की या सज़ा हैं चाँद की कि अकेला हैं तारों के साथ भी, और तारों के बाद भी
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कभी रगों के लहू से टपकी, तो कभी बदन के पसीने से। कभी थरथराते होटों से, तो कभी धधकते सीने से। टपकी है हर बार, आजादी, यहाँ घुट-घुट के जीने स...
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