Tuesday, August 16, 2016

कभी रगों के लहू से टपकी

कभी रगों के लहू से टपकी,
तो कभी बदन के पसीने से।
कभी थरथराते होटों से,
तो कभी धधकते सीने से। 
टपकी है हर बार,
आजादी,
यहाँ घुट-घुट के जीने से।


मैं आजाद हूँ... क्या ?