Tuesday, September 21, 2010

एक मुकम्मल जहाँ की तलाश अधूरी हैं

एक मुकम्मल जहाँ की तलाश अधूरी हैं
हर एक बूंद हो के भी नहीं पूरी हैं|

एक-एक कदम तनहा हैं यहाँ
आशियाँ तो हैं मगर पनाह हैं कहाँ|

गिरे जो हम सपनों की खाई में
कह न सके एक शब्द अपनी सफाई में|

अब तो हम हैं, ये सपने हैं और बची-खुची
ये जिंदगी हकीकत की परछाई में|