Saturday, March 26, 2011

हैं बसेरा छोटा यहाँ, खत्म होने को समां रे

हैं बसेरा छोटा यहाँ, खत्म होने को समां रे
फिर क्यूँ करता पंछी, तू तिनका जमा रे?
आगे नीला, स्वछंद, खुला आसमां रे
क्यूँ वक़्त जाया कर तिनका जमा रे?

आजाद हैं तू, कर आजादी बयां रे
पल भर का सराया, नहीं तेरा जहाँ रे
तू उड़ने के काबिल, फिर क्यूँ फंसा यहाँ रे?
क्यूँ वक़्त जाया कर तिनका जमा रे?

देख नयन खोल तेरा कौन यहाँ रे
मतलब के लोग, मतलब का जहां रे
खोजता जिस प्रीत को नहीं वो यहाँ रे
क्यूँ वक़्त जाया कर तिनका जमा रे?


Tuesday, March 01, 2011

लम्हा-लम्हा टपक गया

लम्हा-लम्हा टपक गया
यादों के बादल से
गीली हो गई मन की मिट्टी
बातों के दल-दल से
फिसल रहे हैं दिल के कदम
बीते रातों के कल-कल से