Sunday, March 29, 2015

साँसें, क्यों कभी तुम रूकती नहीं

जब से होश सम्हाल हैं
तबसे तुम्हें चलते देखा हैं
पल-पल की गिनती तुमसे होते देखा हैं
क्या कभी तुम थकती नहीं
साँसें,
क्यों कभी तुम रूकती नहीं!

Saturday, March 28, 2015

ख़ामोशियों में छुपी हैं सिसकियाँ कई

ख़ामोशियों में छुपी हैं सिसकियाँ कई, 
डर लगता हैं फ़िसल जाए न कहीं।
बेड़ियों में बंधी हैं तन्हाईयाँ नई,
मौम सा पिघल जाए न कहीं। 
सुबक-सुबक के रोता हैं यह दिल,
बूंद बनके निकल जाए न कहीं।

Saturday, March 14, 2015

हमने ख़ुदा से जो ख़ुदाई माँगली

हमने ख़ुदा से जो ख़ुदाई माँगली,
जिंदगी के बदले, जैसे तन्हाई माँगली।
अब तो साँसे भी चलती हैं रुक रुक के
एक गुस्ताख़ी की, ख़ुदा, क्या भरपाई माँगली।