Tuesday, February 07, 2012

हर शाम

हर  शाम  यूँ  ही  खो  जाती  हैं  और 
यूँ  ही  हर  शाम  का  इंतज़ार  रहता  हैं


हर  चेहरे  में  उनका  चेहरा  देख 
यूँ  ही  दिल  ज़ार-ज़ार  रोता  हैं

हर  बहती  हवा  को  रोक-रोक  कर 
यूँ  ही  इस  प्रेम  का  आधार  खोजता  हैं  


हर  नदी  की  बूंद  में  डूब  कर 
यूँ  ही  इस  नदी  की  धार  खोजता  हैं  


इस  जंग  की  जीत  का  कर  बलिदान 
यूँ  ही  खुद  के  लिए  हार  खोजता  हैं

Monday, February 06, 2012

आज फिर

आज फिर दिल परेशान हैं 
आज फिर आधी सी जान हैं
आज फिर कुछ ख्याल आया
आज फिर  उनका ध्यान हैं

आज फिर जख्म रिस गए
आज फिर अरमान पीस गए
आज फिर बंधनों के दायरे में
कुछ सपने घिस गए

आज फिर शाम आई हैं
आज फिर शाम का इंतज़ार हैं
आज फिर में कुछ भूल गया
आज फिर हुआ, जो होता बार-बार हैं

Tuesday, January 24, 2012

मैं कौन हूँ?

जाड़े की ठंडी तपिश हूँ
ग्रीष्म की गरम चुभन हूँ
आवाज़ की चिलाती मौन हूँ
मैं कौन हूँ?

दिशा का भ्रमित ठौर हूँ
मन का विचलित शांत हूँ
जीवन का मृतक मौन हूँ
मैं कौन हूँ?

जल की तरलता का ठोस हूँ
भ्रमर का तृप्त प्यास हूँ
आंधी की व्याकुलता मौन हूँ 
मैं कौन हूँ?

Sunday, January 22, 2012

हम

ये कहाँ चले,
किन रास्तों पे हम
कहाँ ठिकाना,
किस मंजिल के हम
ना उजाले का सहारा
ना अँधेरे के हम
वक़्त रुकता नहीं,
नहीं वक़्त के हम
जमीं थमती नहीं,
नहीं घूमते हम
सबसे परे राही,
बिन रास्तों के हम
   

Thursday, April 21, 2011

जीवन-धार

संग जीवन-धार के
तैर उस पार रे
तू तेरा पतवार रे
क्यूँ बैठा हार के
राजा, रंक या साहूकार रे
मरना एक बार रे
क्यूँ किनारे बैठ मरता बार-बार रे
यह लड़ाई तेरी लड़ आर-पार रे

कुछ लम्हे ये उधार के

मिले हैं दिन चार रे
क्यूँ करता तकरार रे
जीवन को मार के
जी रहे हार के
कुछ लम्हे ये उधार के

प्रेम जीवन-आधार रे
प्रेम जीवन-सार रे
प्रेम सूरज-चाँद-तार रे
प्रेम में हार के
कुछ लम्हे ये उधार के

दो बोल, प्यार के
बोल दो प्यार से
बन प्रेम-कुसुम, प्रेम-हार के
जी लो,
कुछ लम्हें ये उधार के
 

Wednesday, April 13, 2011

क्रांति बन चली

मंद मंद बहती बयार
अब आंधी बन चली
बन्धनों को कर तार-तार
अब क्रांति बह चली

खोल दो प्रहरी ये द्वार
जन-क्रांति बह चली
ख़त्म होने को भ्रष्टाचार
विश्व-शांति कह चली

ये खेल होगा अब आर-पार
जन-भ्रान्ति हट चली
जन-क्रोध का चढ़ता पारावार
भांति-भांति बढ़ चली

बदलाव के चक्र का प्रहार
अब अंधी बन चली
मिट जायेगा दुराचार
ईश्वर से संधि मन चली

Saturday, March 26, 2011

तिनका जमा रे

हैं बसेरा छोटा यहाँ, खत्म होने को समां रे
फिर क्यूँ करता पंछी, तू तिनका जमा रे?
आगे नीला, स्वछंद, खुला आसमां रे
क्यूँ वक़्त जाया कर तिनका जमा रे?

आजाद हैं तू, कर आजादी बयां रे
पल भर का सराया, नहीं तेरा जहाँ रे
तू उड़ने के काबिल, फिर क्यूँ फंसा यहाँ रे?
क्यूँ वक़्त जाया कर तिनका जमा रे?

देख नयन खोल तेरा कौन यहाँ रे
मतलब के लोग, मतलब का जहां रे
खोजता जिस प्रीत को नहीं वो यहाँ रे
क्यूँ वक़्त जाया कर तिनका जमा रे?


Tuesday, March 01, 2011

लम्हा

लम्हा-लम्हा टपक गया
यादों के बादल से
गीली हो गई मन की मिट्टी
बातों के दल-दल से
फिसल रहे हैं दिल के कदम
बीते रातों के कल-कल से

Monday, February 28, 2011

तुम पास नहीं थे

हतास भी नहीं थे 
निराश भी नहीं थे
लेकिन जिंदगी के
पास भी नहीं थे  

तृप्त भी नहीं थे
प्यास भी नहीं थे
सपने कुछ
खास भी नहीं थे

आजाद भी नहीं थे
दास भी नहीं थे
अनोखे आश भी नहीं थे

गम भी नहीं थे 
हास भी नहीं थे
क्योकि तुम पास नहीं थे |

Saturday, January 22, 2011

कब तुम आओगे

जिंदगी के कुछ पल
बीत गये इस इंतज़ार में
कि कब तुम आओगे,
कि कब तुम आओगे |


कभी सोचा ना था कि
रहूंगी इतना बेक़रार मैं
कि कब तुम आओगे,
कि कब तुम आओगे |

दिल लगता नहीं अपना
अब इस संसार में
कि कब तुम आओगे,
कि कब तुम आओगे |

गहरी नदी हैं सामने,
मैं खड़ा इस पार में
कि कब तुम आओगे,
कि कब तुम आओगे |



बाते

तेरी बाते
जो याद आई
तेरी बाते
कुछ अनकाही
तेरी  बाते
भूली हुई बाते
मैंने कभी कही
तेरी बाते
ये बाते
कैसी बाते
तेरी बाते
गूंजी बाते
तेरी बाते

पल

मैं जिस सवेरा को खोजता
रहा हर अँधेरे में कहाँ-कहाँ
मालूम ना था कि वो
मिलेगा तुमसे मिलके यहाँ |
वो उड़ते लहराते हुए आसमां
के नीचे इठलाता हुआ बादल,
उसी मस्ती में झूमकर उठता
हुआ एक मस्तमौला नया कल,
के आँगन में मासूम से एक किनारे,
ठिठोली करता हुआ मासूम सा पल |

Saturday, January 01, 2011

नया

हर दिन नया, हर पल नया 
हर सुबह, शाम और कल नया 
हर सोच नया, हर खोज नया 
हर कदम, हर रोज़ नया 

Monday, December 06, 2010

मैं चल पड़ा-1

मैं चल पड़ा अपनी सफ़र पे,
ले सपनों की गठरी सर पे |

आँखों में भर एक चमक,
चाल में लिए मस्त खनक |
अजनबी दुनिया की गोद में,
मैं बढ चल एक खोज में |
कुछ हैरानी से, कुछ डर से
मैं निकल पड़ा घर से |
दुःख को मैं सहलाता चला,
ठेश को मैं भुलाता चला |



Thursday, December 02, 2010

इश्क कर न सका

तेरे इंतज़ार को ख़त्म कर ना सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
सपनों में हकीकत भर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
किसी की आँखों में डूब के मर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
उस एहसास में तैर के तर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |

Sunday, November 28, 2010

हल-चल

अजीब हल-चल हैं
अजनबी पल हैं

जो साथ आज,
नहीं वो कल हैं

काली रात का
काला दलदल हैं

Saturday, November 13, 2010

पता नहीं

आज रोते हुए भी खुश हूँ क्योंकि कल का पता नहीं .
आज तो दर्द भी हैं साथ... कल इसका भी पता नहीं.
मंजिल हैं, राहें हैं, मगर मेरे चाल का पता नहीं .
मेरे कल का पता नहीं .
मेरे आज का पता नहीं.
मेरे कल का पता नहीं.

खोजता हूँ चाँद को उस फलक पे जिसका कोई पता नहीं.
बैठा इस उधेड़बुन में मैं कि कब सवेरा हो पता नहीं .
खुली जो आँखें कभी, हकीकत था या सपना पता नहीं .
मेरे कल का पता नहीं .
मेरे आज का पता नहीं.
मेरे कल का पता नहीं.

दुश्मनी कर ली खुद से जाने कब, पता नहीं .
मिले कोई कहाँ अब जब खुद का ही पता नहीं .

Friday, November 05, 2010

खोजता हूँ

कई बार मैं सोचता हूँ
खुद को खुद में खोजता हूँ |
खो गया मैं कहाँ
हर पल यही सोचता हूँ |
चला था जिस मस्ती में कभी
अब उस मस्ती को खोजता हूँ |
बदरंग नहीं हैं जिंदगी
फिरभी रंग को खोजता हूँ |
खुद को खुद में खोजता हूँ |


पत्ते-पत्ते झडे थे जिस डाली से
उस डाली के वृक्ष को खोजता हूँ |
भरी थी सावन में नदियाँ जिस बारिश से
उसके हर बूंद के बादल को खोजता हूँ |
मैं खुद में खुद को खोजता हूँ |


Tuesday, September 21, 2010

एक मुक्कमल जहाँ

एक मुक्कमल जहाँ की तलाश अधूरी हैं
हर एक बूंद हो के भी नहीं पूरी हैं|

एक-एक कदम तनहा हैं यहाँ
आशियाँ तो हैं मगर पनाह हैं कहाँ|

गिरे जो हम सपनों की खाई में
कह न सके एक शब्द अपनी सफाई में|

अब तो हम हैं, ये सपने हैं और बची-खुची
ये जिंदगी हकीकत की परछाई में|


  

Monday, June 28, 2010

दूर कहीं

चलते-चलते दूर कहीं निकल गया हूँ, माँ
जलते-जलते मोम सा पिघल गया हूँ, माँ
दर्द के कई घुट अब तक निगल गया हूँ, माँ
चिकनी राह में कई बार फिसल गया हूँ, माँ


मैंने ऊपर की पंक्तियाँ लिखी | आगे कुछ नहीं लिख पाया तो मैंने उसे यथावत पोस्ट कर दिया | मेरे प्रिय मित्र पंकज ने इससे बड़ी खूबसूरती के साथ आगे बढाया | नीचे पढ़िए |


चाहे कितना भी दूर निकलू, 
पर हमेशा तेरे पास ही हूँ, माँ 


तेरी याद की ठंडी छाहों में, पिघलने 
के बाद फिर से जम गया हूँ, माँ 


दर्द के हर घूंट को तेरे हाथ का निवाला 
समझ, बड़े प्यार से निगला गया हूँ, माँ 


चिकनी राह पे जब भी फिसला, तेरा 
हाथ पकड़ फिर संभल गया हूँ, माँ 


Saturday, June 19, 2010

प्यार बताने में

जिंदगी बीत जाये रूठे को मनाने में
कहीं देखा हैं ऐसा प्यार ज़माने में ?
हम तो नहीं यकीन करते जताने में,
कि क्या रखा हैं प्यार बताने में |


हम सिरफिरे, विश्वास करते कर जाने में,
तैर के जाने में या फिर डूब के मर जाने में |
हौसला बुलंदी चढ़ा हमारा, इश्क के पैमाने में,
मजा ही क्या जो ना टपका छलक जाने में |

Wednesday, June 16, 2010

देखता हूँ

कई बार चलते-चलते 
                             यूँ ही पलट के देखता हूँ 
एक धुंधली सी तस्वीर 
                             अपने पलक पे देखता हूँ
ढक लिया जिसने जेहन को, 
                             उसे फलक पे देखता हूँ  
सुन्दर इतना हो सकता कैसे कोई 
                             एक ललक से देखता हूँ 
रहता इंतज़ार तबका जब तुम्हारे  
                             एक झलक को देखता हूँ 


कई  बार चलते-चलते 
                             यूँ ही पलट के देखता हूँ 
...


शायद कहना आसान होता

प्रिये जब तक थे तुम पास मेरे,
मैं तुमसे क्यूँ कुछ ना कह पाया ?
जो दूर गए तब मुझको होश आया
क्यूँ दिल इतना परेशान रहता,
शायद कहना आसान होता |

कोस-कोस कर खुद को मैं
क्या वक़्त को लौटा सकता,
ना ही एक हादसा कह, भुला सकता |
अभी जिन्दा मैं, कभी जिन्दा अरमान होता,
शायद कहना आसान होता |

डरता था तेरे ना से मैं
कैसे तब जी पाता
काश मैं साहस कर पाता
तो मंज़र यह ना सुनसान होता,
शायद कहना आसान होता |

Tuesday, June 15, 2010

मेरी कहानी

ये शब्द ही मुझे अहसास दिलाते कि मैं हूँ
मुझे समझाते हैं, फुसलाते हैं कि मैं कहूँ |
अक्सर भावहीन रहती हैं मेरी कहानी
होठ चुप ही रहते, मैं कहता कलम की जुबानी |


मेरे सोच को लगा रहता हर वक्त एक खोज,
बुनता रहता नित नए ख्वाब हर रोज |
और हर ढ़लती शाम के साथ खो जाता
जाने कहाँ, किस आसमान में सो जाता |


हर उगते दिन के साथ वो भी जागता
फिर नए जोश और रफ़्तार में भागता |
यही छोटी सी बात थी बतानी
शब्दों का जोड़ यहाँ, कहते मेरी कहानी |

Monday, June 14, 2010

जिंदगी एक खोज

जिंदगी एक खोज हैं अपनी तरह की,
अनजाने रास्तों और बेगाने मंजिल की|
दे एक खाली कापी, एक स्याही-दवात
सौप दिया हमें किस्मत के हाथ| 
खुद ही लिख लो अपनी-अपनी कहानी 
अपने शब्द, अपना अर्थ, अपनी जुबानी| 


कुछ खड़े रह गए खोये-खोये से, 
कुछ लिख गए शब्द जागे-सोये से| 
कुछ नया लिखने को उत्प्रेरित हुए, 
और कुछ साहसिक लेखक उद्घोषित हुए| 


हूँ खड़ा कहाँ मैं, 
लगा हूँ यह जाने में| 
एक नहीं मैं, शायद, सब हूँ| 
हैं इंतज़ार रब की सुनू, 
जो रहता मेरे अन्दर हैं 
और कहता बहुत धीरे हैं, 
कि इस जिंदगी के खोज का 
अंत कहाँ और कहाँ सिरे हैं| 

Saturday, June 12, 2010

जिंदगी

जिंदगी एक पहेली, 
                        एक खोज हैं|
जिंदगी एक दर्द, 
                        एक मस्ती-मौज हैं|
जिंदगी एक कहानी, 
                        एक सोच हैं|
जिंदगी एक जंग, 
                        हर-रोज़ हैं|

Friday, June 11, 2010

क्या याद किया

हूँ लिख-लिख के सब भूल गया
मैं क्या छोड़ा, क्या याद किया |


शब्दों के बीच खो गया, जाने 
कब, तुम से फरियाद किया |


अब मिट गया वो दर्द जो कभी 
दिल को मेरे आबाद किया |


जी रहा हूँ संग अपने, देखो,
सूनेपन को बर्बाद किया |


करना था जो पहले मुझको,  
क्यूँ सब करने के बाद किया ?


क्या याद किया, क्या फ़रियाद किया
क्यूँ सब करने के बाद किया ?

Thursday, June 10, 2010

हजारों ख्वाहिशें ऐसी...3

ले लूँ तपिश धरती की, 
मैं फैला दूँ शितलता,
निकाल द्वेष ह्रदय से,
मैं भर सकूँ निर्मलता 
हे नाथ, क्या यह
लगती मुमकिन सी?


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|


प्रेम करना
इतना मुश्किल,
जल रहा 
सबका दिल,
बन सावन फुहार
मैं बरसू झड़ी सी |


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|


Friday, June 04, 2010

हजारों ख्वाहिशें ऐसी...2

ख्वाबों के पंख इस जहाँ,
उस जहाँ के होते|
उड़ान उसकी बेपरवाह,
आसमां के होते|
उड़ जाऊं मैं, हवाओं में,
ख्वाब-पंख फेलाए चिड़िया सी|


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|


हैं शर्द मौसम,
गर्म कभी|
हैं जकड़न तो,
नर्म कभी|
तुषार हूँ, तपिश हूँ
मैं ओजस्वी|


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|


बूंद एक आँखों से
कहते दिल का मर्म,
अदृश्य बूंद दिल के,
प्रेम, नफरत, घृणा या शर्म|
ना इन जैसी हूँ, 
मैं एक बूंद ओस की|


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|

Wednesday, June 02, 2010

हजारों ख्वाहिशें ऐसी...1

बहती धरा पे छम-छम 
झूम के चलूँ मैं,
ऊपर आसमान से 
इठला के कहूँ मैं,
क्या आजादी तुम्हें, 
मिली हैं मुझ जैसी?


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी |


भँवरा जो भ्रमण
करता कुसुम का,
पान करता रस 
बन मासूम सा,
बन जाऊँ वो भ्रमर
मैं, हैं इक्छा ऐसी|


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी |


बदली जो घिरती सावन 
में, गाती राग मलार,
तृप्त हो गई धरती मानों,
ग्रीष्म की मनाए हार |
मुकुट-विजयी पहना के, 
नाचूँ धरा संग, बन रूपसि |


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी |


मेरा परिचय

भगवान हूँ,
शैतान हूँ,
तुम्हारी संतान हूँ, 
जग, कर मेरी जय| 
मेरा परिचय|


पाषाण हूँ,
परेशान हूँ,
आखिर इंसान हूँ|
लगता मुझको भय|
मेरा परिचय|


वरिष्ठ हूँ,
बलिष्ठ हूँ,
मैं कर्मनिष्ठ हूँ|
उर मेरा तेज़मय|
मेरा परिचय| 


आक्रांत हूँ,
शांत हूँ,
क्यूँ भ्रांत हूँ?
नहीं कोई आश्रय|
मेरा परिचय|


प्रेम हूँ,
नर्म हूँ,
शीतल कभी, गर्म हूँ|
ऐसा मैं अज्ञेय|  
मेरा परिचय|

क्या कहता हैं मेरा दिल

क्या कहता हैं मेरा दिल


क्यूँ हूँ शब्दों में शामिल ?
लिख लिख के क्या हासिल
कहीं और जाना, नहीं यह मंजिल
रस्ते जो मिलते, थोड़े मुश्किल
खुद ही सहारा, खुद ही कातिल
बस लहरों का संग, दूर साहिल.


डर मत पगले, अनजानों से मिल
उपवन का फूल तू, खुल के खिल
भर विश्वास उर में, अपनी किस्मत सिल
बन जा विशाल, जोड़ सपनों का तिल 
ये नहीं मुश्किल, ये नहीं मुश्किल,
बस, यहीं कहता मेरा दिल |

पहचान

पहचान,
खो गया कहीं
इस भीड़ में|
साथ था,
पर अब नहीं|


पहचान,
जिसे सम्हाला, 
युगों से मैं,
एक पल में 
खो डाला|


पहचान,
गया कहाँ
न समझ पाया|
चौकन्ना था पर,
अब कहाँ |


पहचान,
अब बनाऊ कैसे,
गलती कहाँ,
खोजूं कहाँ 
और कैसे ?

Tuesday, June 01, 2010

कविता

कविता,
एक चिंतन,
              एक मंथन,
एक आगाज़,
              एक परिवर्तन,
एक सोच,
               एक खोज़,
एक भवर,
               एक भ्रमर,
एक क्रंदन,
              एक स्पंदन,
एक परिचय,
             एक पर-जय,
 एक दुहिता,
             एक परिणीता,
एक उल्लास,
            एक त्रास,
शायद,
           एक प्रेम,
या सिर्फ 
            एक भ्रम ?

कई बार

कई बार गम में भी, कम ही सही,
जीने की एक वजह खोजते
और,
कई बार खो जाते खुशियों की
भीड़ में, खुद को ही खोजते-खोजते |


कई बार मकसद-विहीन
हो के भी लीन रहते
और,
कई बार पास रह के
भी मंजिल नहीं पाते |


कई बार अपनों के बीच
भी, अपने खो जाते 
और,
कई बार बेगानों से निकल
आते जन्मों के नाते |


कई बार बातों में भी
शुकून नहीं मिलता
और,
कई बार बीन कहे ही
मन हैं खिलता |


कई बार सब मिलके
भी कुछ नहीं मिलता
और,
कई बार सब खो के भी
हम क्या नहीं पाते !

Saturday, May 29, 2010

दर्द

दर्द के बिना क्या ये जिंदगी अधूरी हैं?
क्या ह्रदय-अवसाद का रिसना जरुरी हैं?
मातम मनाते रहे क्यूँ हर पल यहाँ,
क्या अविरत रोना हमारी मज़बूरी हैं?


विषाद ही मिला हैं अब तक चलते-चलते,
क्या संगिनी प्रियतम-प्रेरणा माधुरी हैं?
रिस गया हैं लहू जिस्म से सारा,
क्या प्राण-रस-बिन जिंदगी दुलारी हैं?


कंटकों के शर जो चुभ रहें हैं पाँव में
क्या तन मेरा हिम-स्थूल हिमाद्री हैं?
विस्मित हूँ, विरह-वेदना के घाव हरे हैं,
क्या नियति-नियोग, निश्चल-प्रेम पे भारी हैं?


पथरीले नयन, थके कदम, हतास मन
क्या यह विचिलित-व्यक्तित्व हमारी हैं!
जमे रक्त-संचार, जकड़ी नसें, मद्धम ह्रदय-गति 
क्या यह विकराल-काल यम की आरी हैं? 


यह क्या! अनायास ही बह चली
यह कैसी अमृतरस-कुसुम की बयारी हैं!
क्या मैं हूँ मरुस्थली-धरा पे या
हे देव, यह पावन-उपवन तुम्हारी हैं? 

Thursday, May 27, 2010

एक बूंद

काफिले कई लगे,  
                     कारवां गुजरते गए 
महफिले कई सजी,
                     मेहेरबा निकलते गए 
सम्मा कई जली,
                     परवाने पिघते गए 
(रूप की) आंधियां कई चली,
                     दीवाने मचलते गए 


नदियाँ कई बही,
                    एक बूंद को तरसते रहे
सदियाँ कई बीती,
                   एक पल को लरसते रहे 

Wednesday, May 19, 2010

जंग के मैदान को देखा



जंग के मैदान को देखा, 
रक्तरंजित धरती देखी |


लाशों का ढ़ेर देखा, 
उनकी तन्हाई देखी |


ज़ख्म से बहते खून को देखा, 
खून से सनी मिट्टी देखी |


भयभीत चेहरों को देखा, 
दिल की खामोशी देखी |


नफरत और घृणा के आग को देखा, 
आग में झुलसे प्रेम को देखा |


सिपाहियों की सरफरोशी देखी, 
सन्नाटे की आगोशी देखी |


अपने भाइयों को मरते देखा, 
सीने के टुकड़े को लड़ते देखा |


जीत की ख़ुशी मानते देखा, 
हार के मातम को देखा |


जंग के मैदान को देखा, 
जंग के मैदान को देखा |

ये कविता मैंने २००१ या शायद २००२ में कभी लिखी थी | जो भाव इस कविता में नीहित हैं वो बीते हुए युगों में भी प्रासंगिक था, आज भी हैं और तब तक रहेगा जब तक जंग होते रहेंगे |
धन्यवाद

Friday, April 02, 2010

जलजला

रोते हैं हम, लेकिन सिसकियाँ दबा लेते हैं

एक झूठी मुस्कान होटों पे सजा लेते हैं |

दिल का दर्द, हम किस से कहें

खुद को ही समझा लेते हैं |

उठते इस तूफान को दिल में समेटे हुए

खुद ही जलजले का मज़ा लेते हैं |


Wednesday, March 31, 2010

तुम

पिघलते हुए जलते मौम की लौ में
चमकता हुआ खुबसूरत तेरा चेहरा.
सरमाते हुए उगते चाँद की रौशनी में
गहराता हुआ इन घटाओं का पहरा.


थराते हुए सुर्ख होठों की ख़ामोशी में
गुम पड़े लफ़्ज़ों का संग, गहरा.
नम हुए खोजते आँखों की सरगोशी में
सोए पड़े एक ख्वाब का जागता सवेरा.


धड़कते हुए शांत दिल की धड़कन में
खोए किसी जज्बात का छुटता सहारा.
खींचे हुए परेशान भोंओं की शिहरण में
खोजता किसी डूबते विचारों का किनारा.

Friday, March 19, 2010

जानू ना जानू मैं...

जानू ना जानू मैं
कि
चाहू मैं चाहू क्या |

चलू जो चलू
इन
रास्तों पे,
जानू ना जानू मैं
ये
जाये तो जाये कहाँ |

खोजू जो खोजू मैं, पर
क्या
कहते जो कहते मंजिल
जिसे
पाऊँ तो पाऊँ कहाँ |

देखू तो देखू
क्या
दिखे जो वो चाहू ना |

कहूँ तो कहूँ
किस्से
वो खुदा क्यूँ मिले ना |

Thursday, March 11, 2010

अजनबी

गगन चुम्बी इमारतों के बीच से

जाती हुई एक सड़क पे

गाड़ियों की क़तर में

मैं बैठा किसी किनारे

देख रहा हूँ उन गाड़ियों में

बैठे लोगों को

शायद पहचानू किसी को|

नजरे मिलती हैं एक खालीपन से|

इस भीड़ में चलते हुई हम सब

अजनबी है|


Thursday, September 03, 2009

ये जहाँ, वो जहाँ...

रिस्तो का दामन पकड़
जब मैं चला, मैं चला 
मुझे लगा सब हैं  
यहाँ, सब हैं यहाँ. 
एक एक कर जब टूटे रिस्ते 
तब लगा मैं कहाँ, मैं कहाँ. 
कहने को सब अपने हैं 
पर अपने हैं कहाँ, हैं कहाँ.  
ढूंढा बहुत मैं यहाँ,
मैं वहां, जाने कहाँ, जाने कहाँ. 
सब मिले फिर, जो ना मिला 
वो रिस्ता कहाँ, वो रिस्ता कहाँ  
जब मैं देखा, वो कहाँ 
और मैं कहाँ, मैं कहाँ. 
वो रहे जमीं और 
मैं आसमान, मैं आसमान. 
अब मेरे संग मेरे खुदा 
जो छुटा, ये जहाँ, वो जहाँ. 
दर्द हृदय का हमदर्द 
बना, हमदर्द बना. 
जग का छुटा संग  
अपना बना, अपना बना.
शांत हुआ मन मेरा अब 
स्थिर मेरा जहाँ, मेरा जहाँ 
तन का प्रेम जो सिमटा  
मन का विस्तार हुआ, विस्तार हुआ 
भ्रम टूटे कई जो 
सत्य स्वीकार हुआ, स्वीकार हुआ  
हृदय गति मद्धम हुई, अंतर्मन 
का चितकार हुआ, चितकार हुआ. 
डोल उठी वासनाएं सारी, द्वंद  
और हाहाकार हुआ, हाहाकार हुआ 
भंग हो रहे हैं मोह सारे, यह 
नया चमत्कार हुआ, चमत्कार हुआ 
अब मैं ब्रह्म हूँ, ब्रह्म में मैं  
वाह! क्या अविष्कार हुआ, अविष्कार हुआ

Saturday, March 21, 2009

मेरे चित-चोर

गुजरती हुई बहार की एक भोर
आए हो तुम बन बादल घन-घोर.
छा गए मेरे दिल के आसमान पर
मेरे प्रिये, मेरे प्रीतम, मेरे चित-चोर.

स्थिर पड़े भावों में ये कैसा हैं ज़ोर
हलचल मचा किनारे की ओर.
शांत हैं सब उस पार, मगर
इस पार, ये कैसा सन्नाटे का शोर.



Tuesday, December 02, 2008

हे जवानी जागो

हे जवानी जागो !!!

रण में रण-घोष हुआ है
आज रगों में जोश हुआ है
है पुकार रहा वतन तुमको
हे जवानी जागो !!!

बहुत हो चुका अब नहीं
खून है अपना, पानी नहीं
रीसने दे कैसे इस तन को
हे जवानी जागो !!!

गर दम नहीं है तन में
ठंडा पड़ा जोश मन में
हम है यहाँ, छोड़ो तुम गद्दी को
हे जवानी जागो !!!

भ्रष्ट हुआ है सोच तुम्हारा
नहीं भ्रष्ट है ज़मीर हमारा
तील-तील नहीं मरने देंगे जन को
हे जवानी जागो !!!



Sunday, August 17, 2008

उनका ख्याल

आज दस सालों बाद भी ये ख्याल आता हैं,
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं,

यूँ तो जुबां पे उनका नाम नहीं हैं
पर रह-रह के ये सवाल आता हैं
कि आख़िर क्यूँ उनका ख्याल आता हैं.

मुड़ गए वो तो एक मोड़ पे, जाने क्यूँ
ये याद हर साल आता हैं
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं.

कहते नहीं हम कुछ भी महफिल में
क्यूँकि जुबान पे सिर्फ़ दिल का हाल आता हैं
कि आज भी उनका ख्याल आता हैं.



एक नई सुबह...

रात का आलिंगन कर
जब आई एक नई सुबह |

हर ओर उजाला फैलाती ,
लेकर किरण आई एक नई सुबह |

अचानक ही चहकने लगा जीवन
सुर में गाती आई एक नई सुबह |

डर और विस्मय को दे विराम
रगों में ऊर्जा भरने आई एक नई सुबह |

रुके हुए थे जो कदम, नई राह
को लेकर आई एक नई सुबह |

बढता जा रे पथिक, अविरत
तुझे लेने आई एक नई सुबह |

Thursday, August 14, 2008

जहान्वी, मैं आज तुम्हारी नजरों से देख रहा हूँ

आज, मैं तुम्हारी नजरों से, दुनिया देख रहा हूँ

ग़म कैसा, कुछ नहीं से,
बहुत कुछ देख रहा हूँ.
कल तक बढ़ता ही जा रहा था
जिंदगी में, आज थम के देख रहा हूँ.
खुशियों की मुस्कान तो देखी नहीं, पर हाँ,
आज ग़म की आँसुओं को देख रहा हूँ.
जहान्वी, मैं आज तुम्हारी नजरों से देख रहा हूँ

बदलते इंसानी फितरत को
अपने जेहन में देख रहा हूँ
अपनों से बेगाने होते लोगों को
अपने आँगन में देख रहा हूँ.
अपनाया किसे नहीं मैंने अपना कह के,
और वक्त पे मुकरते हुए अपनों को देख रहा हूँ.
जहान्वी, मैं आज तुम्हारी नजरों से देख रहा हूँ

ठहरे हुए पानी में उठते हुए
हलचल को देख रहा हूँ.
जगती आंखों से, सोते हुए
पल को देख रहा हूँ.
लिपटे हुए कफ़न में
जिन्दा हसरतो को देख रहा हूँ.
जहान्वी, मैं आज तुम्हारी नजरों से देख रहा हूँ

Monday, June 16, 2008

देखता हूँ...

देखता हूँ जब भी दुनिया को,
ख़ुद को खड़ा पाता हूँ.

दौड़ते भागते लोगों के बीच
पता नहीं, ख़ुद को कहाँ पाता हूँ?

हर रास्ते की हैं एक मंजिल, जानता हूँ
फिरभी ख़ुद को चौराहे पर, खड़ा पाता हूँ.

अपनों के बीच भी
ख़ुद को तनहा पाता हूँ.

सिफारिश करूँ अपनी खुशियों की
किससे, नहीं वो खुदा पाता हूँ.

बढ़ रहा हूँ मंजिल की ओर,
पर किधर, नहीं वो रास्ता पाता हूँ.

Saturday, June 07, 2008

दूर तक जाते रास्तों पर...

दूर तक जाते रास्तों पर
मैं दूर तक चला.
मिले पड़ाव कई मगर
ठिकाना एक न मिला.

बस अब नहीं, हर बार यह
सोच, एक कदम और चला.
जब मुड़ के देखा तब दिखा,
कि मैं तो मीलों चला.

अब रुकना व्यर्थ हैं
पर लगता चलना भला.
न हैं ठिकाना तो क्या
एक पड़ाव तो हर बार मिला.

थोडा रुक लिया, थोडा थम लिया
फिर नए जोश से आगे को चला
पथ दिखें कई, कई बार नहीं
विश्वास दृढ कर हर बार चला

ठेस लगी, गीरा भी कभी
दर्द हुआ, सब सहता चला
काँटों के शर मिले, पर
फूलों का सेज भी मिला

यात्रा का आनंद इसमें सुख-दुःख
धुप-छाव संग, मैं चला.
कह गए है बुजुर्ग, जो
अंत भला तो सब भला.

Thursday, January 04, 2007

जहान्वी, तुम कहाँ हो?

देव-नदी की चंचलता लिए
समेटे हिम-तुषार की निर्मलता
बहती तुम निर्भय हो
कल-कल छल-छल चली आती हो.
जहान्वी, तुम कहाँ हो?

मदमस्त हो झूमता हैं
जिसकी गोद में पवन .
हो के बेफिक्र
प्रवाहित होती हैं
जिसकी रगों में, ऐसी तुम हो.
जहान्वी, तुम कहाँ हो?

भाषा तो अनेकों हैं अधरों पे
पर तुम्हारी बोली हैं प्रेम की
ह्रदय विशाल हैं सागर सा
जिससे अमृत-रस छलकती रहती हो.
जहान्वी, तुम कहाँ हो?

पाप-पुन्य का भेद कैसा
ऊँच-नीच का भावः कहाँ
समेटे जग को अपने आँचल में
एक मधुर मुस्कान लिए,
चली आती हो.
जहान्वी, तुम कहाँ हो?

Friday, November 03, 2006

परछाई

तुम हो या नहीं,
मुझे शायद पता नहीं.
पर ऐसा क्यूँ होता हैं,
आहट तेरे कदमों की
कानों तक आती हैं.
जो देखने को तुम्हें,
नजरे ऊठाता हूँ,
छिप कहीं जाती हो.

मेरी परछाई नहीं हो,
शायद कम भी नहीं हो.
मेरे साथ हो या, 
कहीं नहीं हो.

रास्तों पे जब अकेला,
मैं चलता हूँ, जाने क्यूँ,
साथ तुम भी चलती हो.
ऐसा क्यूँ लगता हैं कि
मैं जानता हूँ तुम्हें
फ़िर भी, अजनबी हो.

फ़ासले तो घटते हैं दो 
कदम आगे चलने पर,
क्यूँ तुम भी दो 
कदम बढ जाती हो.

जिन्दगी, तन्हा बिताने
का सोचा था, पर
ऐ तनहाई!! हर बार
क्यूँ आ जाती हो.