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कभी रगों के लहू से टपकी

कभी रगों के लहू से टपकी,
तो कभी बदन के पसीने से।
कभी थरथराते होटों से,
तो कभी धधकते सीने से। 
टपकी है हर बार,
आजादी,
यहाँ घुट-घुट के जीने से।

मैं आजाद हूँ... क्या ?

आज दोस्तों ने पूछा

आज दोस्तों ने पूछा-
अब तो तुम्हारी कविताएँ
बदल गई होंगी ?
मैंने कहा- हाँ बिलकुल,
कल तक जो कागजों पे थी,
आज हकीकत बन गई है।

ख़ुदा, जो कहीं तुमने जन्नत बनाई होगी

ख़ुदा, जो कहीं तुमने जन्नत बनाई होगी, वो पहाड़ो से झाकती हुई तराई होगी। खोज़ सके तो खोज़ ले दुनिया  कही और नहीं बस यहीं तेरी खुदाई होगी।

वक़्त के समंदर से

वक़्त के समंदर से
कुछ बून्द लम्हों के,
हमने क्या चुराए
एक कहानी बन गई,
एक जिंदगानी बन गई।

लम्हों की शरारत कुछ ऐसी थी

लम्हों की शरारत कुछ ऐसी थी-
उम्र हमे मिला और जिंदगी उन्हें।

कुछ लिखना था

कुछ लिखना था
लम्हों के कागज़ पे,
ख्वाबों के स्याह से।
कमबख्त जिंदगी की
कलम ही टूट गई।

सोचा था पता पूछता हुआ

सोचा था पता पूछता हुआ
मंज़िल तक पहुँच जाऊँगा।
मगर यह न पता था कि
सड़क भी गुमराह करती है।