Monday, December 06, 2010

मैं चल पड़ा अपनी सफ़र पे,

मैं चल पड़ा अपनी सफ़र पे,
ले सपनों की गठरी सर पे |

आँखों में भर एक चमक,
चाल में लिए मस्त खनक |
अजनबी दुनिया की गोद में,
मैं बढ चल एक खोज में |
कुछ हैरानी से, कुछ डर से
मैं निकल पड़ा घर से |
दुःख को मैं सहलाता चला,
ठेश को मैं भुलाता चला |



Thursday, December 02, 2010

तेरे इंतज़ार को ख़त्म कर ना सका

तेरे इंतज़ार को ख़त्म कर ना सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
सपनों में हकीकत भर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
किसी की आँखों में डूब के मर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
उस एहसास में तैर के तर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |