Monday, December 06, 2010

मैं चल पड़ा अपनी सफ़र पे,

मैं चल पड़ा अपनी सफ़र पे,
ले सपनों की गठरी सर पे |

आँखों में भर एक चमक,
चाल में लिए मस्त खनक |
अजनबी दुनिया की गोद में,
मैं बढ चल एक खोज में |
कुछ हैरानी से, कुछ डर से
मैं निकल पड़ा घर से |
दुःख को मैं सहलाता चला,
ठेश को मैं भुलाता चला |



Thursday, December 02, 2010

तेरे इंतज़ार को ख़त्म कर ना सका

तेरे इंतज़ार को ख़त्म कर ना सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
सपनों में हकीकत भर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
किसी की आँखों में डूब के मर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |
उस एहसास में तैर के तर न सका,
मैं कभी इश्क कर न सका |

Sunday, November 28, 2010

अजीब हल-चल हैं

अजीब हल-चल हैं
अजनबी पल हैं

जो साथ आज,
नहीं वो कल हैं

काली रात का
काला दलदल हैं

Saturday, November 13, 2010

आज रोते हुए भी खुश हूँ क्योंकि कल का पता नहीं

आज रोते हुए भी खुश हूँ क्योंकि कल का पता नहीं .
आज तो दर्द भी हैं साथ... कल इसका भी पता नहीं.
मंजिल हैं, राहें हैं, मगर मेरे चाल का पता नहीं .
मेरे कल का पता नहीं .
मेरे आज का पता नहीं.
मेरे कल का पता नहीं.

खोजता हूँ चाँद को उस फलक पे जिसका कोई पता नहीं.
बैठा इस उधेड़बुन में मैं कि कब सवेरा हो पता नहीं .
खुली जो आँखें कभी, हकीकत था या सपना पता नहीं .
मेरे कल का पता नहीं .
मेरे आज का पता नहीं.
मेरे कल का पता नहीं.

दुश्मनी कर ली खुद से जाने कब, पता नहीं .
मिले कोई कहाँ अब जब खुद का ही पता नहीं .

Friday, November 05, 2010

कई बार मैं सोचता हूँ, खुद को खुद में खोजता हूँ

कई बार मैं सोचता हूँ
खुद को खुद में खोजता हूँ |
खो गया मैं कहाँ
हर पल यही सोचता हूँ |
चला था जिस मस्ती में कभी
अब उस मस्ती को खोजता हूँ |
बदरंग नहीं हैं जिंदगी
फिरभी रंग को खोजता हूँ |
खुद को खुद में खोजता हूँ |


पत्ते-पत्ते झडे थे जिस डाली से
उस डाली के वृक्ष को खोजता हूँ |
भरी थी सावन में नदियाँ जिस बारिश से
उसके हर बूंद के बादल को खोजता हूँ |
मैं खुद में खुद को खोजता हूँ |


Tuesday, September 21, 2010

एक मुकम्मल जहाँ की तलाश अधूरी हैं

एक मुकम्मल जहाँ की तलाश अधूरी हैं
हर एक बूंद हो के भी नहीं पूरी हैं|

एक-एक कदम तनहा हैं यहाँ
आशियाँ तो हैं मगर पनाह हैं कहाँ|

गिरे जो हम सपनों की खाई में
कह न सके एक शब्द अपनी सफाई में|

अब तो हम हैं, ये सपने हैं और बची-खुची
ये जिंदगी हकीकत की परछाई में|


  

Monday, June 28, 2010

चलते-चलते दूर कहीं निकल गया हूँ, माँ

चलते-चलते दूर कहीं निकल गया हूँ, माँ
जलते-जलते मोम सा पिघल गया हूँ, माँ
दर्द के कई घुट अब तक निगल गया हूँ, माँ
चिकनी राह में कई बार फिसल गया हूँ, माँ


मैंने ऊपर की पंक्तियाँ लिखी | आगे कुछ नहीं लिख पाया तो मैंने उसे यथावत पोस्ट कर दिया | मेरे प्रिय मित्र पंकज ने इससे बड़ी खूबसूरती के साथ आगे बढाया | नीचे पढ़िए |


चाहे कितना भी दूर निकलू, 
पर हमेशा तेरे पास ही हूँ, माँ 


तेरी याद की ठंडी छाहों में, पिघलने 
के बाद फिर से जम गया हूँ, माँ 


दर्द के हर घूंट को तेरे हाथ का निवाला 
समझ, बड़े प्यार से निगला गया हूँ, माँ 


चिकनी राह पे जब भी फिसला, तेरा 
हाथ पकड़ फिर संभल गया हूँ, माँ 


Saturday, June 19, 2010

जिंदगी बीत जाये रूठे को मनाने में

जिंदगी बीत जाये रूठे को मनाने में
कहीं देखा हैं ऐसा प्यार ज़माने में ?
हम तो नहीं यकीन करते जताने में,
कि क्या रखा हैं प्यार बताने में |


हम सिरफिरे, विश्वास करते कर जाने में,
तैर के जाने में या फिर डूब के मर जाने में |
हौसला बुलंदी चढ़ा हमारा, इश्क के पैमाने में,
मजा ही क्या जो ना टपका छलक जाने में |

Wednesday, June 16, 2010

कई बार चलते-चलते

कई बार चलते-चलते 
                             यूँ ही पलट के देखता हूँ 
एक धुंधली सी तस्वीर 
                             अपने पलक पे देखता हूँ
ढक लिया जिसने जेहन को, 
                             उसे फलक पे देखता हूँ  
सुन्दर इतना हो सकता कैसे कोई 
                             एक ललक से देखता हूँ 
रहता इंतज़ार तबका जब तुम्हारे  
                             एक झलक को देखता हूँ 


कई  बार चलते-चलते 
                             यूँ ही पलट के देखता हूँ 
...
















प्रिये जब तक थे तुम पास मेरे

प्रिये जब तक थे तुम पास मेरे,
मैं तुमसे क्यूँ कुछ ना कह पाया ?
जो दूर गए तब मुझको होश आया
क्यूँ दिल इतना परेशान रहता,
शायद कहना आसान होता |

कोस-कोस कर खुद को मैं
क्या वक़्त को लौटा सकता,
ना ही एक हादसा कह, भुला सकता |
अभी जिन्दा मैं, कभी जिन्दा अरमान होता,
शायद कहना आसान होता |

डरता था तेरे ना से मैं
कैसे तब जी पाता
काश मैं साहस कर पाता
तो मंज़र यह ना सुनसान होता,
शायद कहना आसान होता |

Tuesday, June 15, 2010

ये शब्द ही मुझे अहसास दिलाते कि मैं हूँ

ये शब्द ही मुझे अहसास दिलाते कि मैं हूँ
मुझे समझाते हैं, फुसलाते हैं कि मैं कहूँ |
अक्सर भावहीन रहती हैं मेरी कहानी
होठ चुप ही रहते, मैं कहता कलम की जुबानी |


मेरे सोच को लगा रहता हर वक्त एक खोज,
बुनता रहता नित नए ख्वाब हर रोज |
और हर ढ़लती शाम के साथ खो जाता
जाने कहाँ, किस आसमान में सो जाता |


हर उगते दिन के साथ वो भी जागता
फिर नए जोश और रफ़्तार में भागता |
यही छोटी सी बात थी बतानी
शब्दों का जोड़ यहाँ, कहते मेरी कहानी |

Monday, June 14, 2010

जिंदगी एक खोज हैं अपनी तरह की

जिंदगी एक खोज हैं अपनी तरह की,
अनजाने रास्तों और बेगाने मंजिल की|
दे एक खाली कापी, एक स्याही-दवात
सौप दिया हमें किस्मत के हाथ| 
खुद ही लिख लो अपनी-अपनी कहानी 
अपने शब्द, अपना अर्थ, अपनी जुबानी| 


कुछ खड़े रह गए खोये-खोये से, 
कुछ लिख गए शब्द जागे-सोये से| 
कुछ नया लिखने को उत्प्रेरित हुए, 
और कुछ साहसिक लेखक उद्घोषित हुए| 


हूँ खड़ा कहाँ मैं, 
लगा हूँ यह जाने में| 
एक नहीं मैं, शायद, सब हूँ| 
हैं इंतज़ार रब की सुनू, 
जो रहता मेरे अन्दर हैं 
और कहता बहुत धीरे हैं, 
कि इस जिंदगी के खोज का 
अंत कहाँ और कहाँ सिरे हैं| 

Saturday, June 12, 2010

जिंदगी एक पहेली

जिंदगी एक पहेली, 
                        एक खोज हैं|
जिंदगी एक दर्द, 
                        एक मस्ती-मौज हैं|
जिंदगी एक कहानी, 
                        एक सोच हैं|
जिंदगी एक जंग, 
                        हर-रोज़ हैं|

Friday, June 11, 2010

हूँ लिख-लिख के सब भूल गया

हूँ लिख-लिख के सब भूल गया
मैं क्या छोड़ा, क्या याद किया |


शब्दों के बीच खो गया, जाने 
कब, तुम से फरियाद किया |


अब मिट गया वो दर्द जो कभी 
दिल को मेरे आबाद किया |


जी रहा हूँ संग अपने, देखो,
सूनेपन को बर्बाद किया |


करना था जो पहले मुझको,  
क्यूँ सब करने के बाद किया ?


क्या याद किया, क्या फ़रियाद किया
क्यूँ सब करने के बाद किया ?

Thursday, June 10, 2010

हजारों ख्वाहिशें ऐसी...3

ले लूँ तपिश धरती की, 
मैं फैला दूँ शितलता,
निकाल द्वेष ह्रदय से,
मैं भर सकूँ निर्मलता 
हे नाथ, क्या यह
लगती मुमकिन सी?


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|


प्रेम करना
इतना मुश्किल,
जल रहा 
सबका दिल,
बन सावन फुहार
मैं बरसू झड़ी सी |


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|


Friday, June 04, 2010

हजारों ख्वाहिशें ऐसी...2

ख्वाबों के पंख इस जहाँ,
उस जहाँ के होते|
उड़ान उसकी बेपरवाह,
आसमां के होते|
उड़ जाऊं मैं, हवाओं में,
ख्वाब-पंख फेलाए चिड़िया सी|


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|


हैं शर्द मौसम,
गर्म कभी|
हैं जकड़न तो,
नर्म कभी|
तुषार हूँ, तपिश हूँ
मैं ओजस्वी|


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|


बूंद एक आँखों से
कहते दिल का मर्म,
अदृश्य बूंद दिल के,
प्रेम, नफरत, घृणा या शर्म|
ना इन जैसी हूँ, 
मैं एक बूंद ओस की|


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी|

Wednesday, June 02, 2010

हजारों ख्वाहिशें ऐसी...1

बहती धरा पे छम-छम 
झूम के चलूँ मैं,
ऊपर आसमान से 
इठला के कहूँ मैं,
क्या आजादी तुम्हें, 
मिली हैं मुझ जैसी?


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी |


भँवरा जो भ्रमण
करता कुसुम का,
पान करता रस 
बन मासूम सा,
बन जाऊँ वो भ्रमर
मैं, हैं इक्छा ऐसी|


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी |


बदली जो घिरती सावन 
में, गाती राग मलार,
तृप्त हो गई धरती मानों,
ग्रीष्म की मनाए हार |
मुकुट-विजयी पहना के, 
नाचूँ धरा संग, बन रूपसि |


हजारों ख्वाहिशें ऐसी,
जाने कैसी, जाने कैसी |


मेरा परिचय

भगवान हूँ,
शैतान हूँ,
तुम्हारी संतान हूँ, 
जग, कर मेरी जय| 
मेरा परिचय|


पाषाण हूँ,
परेशान हूँ,
आखिर इंसान हूँ|
लगता मुझको भय|
मेरा परिचय|


वरिष्ठ हूँ,
बलिष्ठ हूँ,
मैं कर्मनिष्ठ हूँ|
उर मेरा तेज़मय|
मेरा परिचय| 


आक्रांत हूँ,
शांत हूँ,
क्यूँ भ्रांत हूँ?
नहीं कोई आश्रय|
मेरा परिचय|


प्रेम हूँ,
नर्म हूँ,
शीतल कभी, गर्म हूँ|
ऐसा मैं अज्ञेय|  
मेरा परिचय|

क्या कहता हैं मेरा दिल

क्या कहता हैं मेरा दिल


क्यूँ हूँ शब्दों में शामिल ?
लिख लिख के क्या हासिल
कहीं और जाना, नहीं यह मंजिल
रस्ते जो मिलते, थोड़े मुश्किल
खुद ही सहारा, खुद ही कातिल
बस लहरों का संग, दूर साहिल.


डर मत पगले, अनजानों से मिल
उपवन का फूल तू, खुल के खिल
भर विश्वास उर में, अपनी किस्मत सिल
बन जा विशाल, जोड़ सपनों का तिल 
ये नहीं मुश्किल, ये नहीं मुश्किल,
बस, यहीं कहता मेरा दिल |

पहचान, खो गया कहीं

पहचान,
खो गया कहीं
इस भीड़ में|
साथ था,
पर अब नहीं|


पहचान,
जिसे सम्हाला, 
युगों से मैं,
एक पल में 
खो डाला|


पहचान,
गया कहाँ
न समझ पाया|
चौकन्ना था पर,
अब कहाँ |


पहचान,
अब बनाऊ कैसे,
गलती कहाँ,
खोजूं कहाँ 
और कैसे ?

Tuesday, June 01, 2010

कविता

कविता,
एक चिंतन,
              एक मंथन,
एक आगाज़,
              एक परिवर्तन,
एक सोच,
               एक खोज़,
एक भवर,
               एक भ्रमर,
एक क्रंदन,
              एक स्पंदन,
एक परिचय,
             एक पर-जय,
 एक दुहिता,
             एक परिणीता,
एक उल्लास,
            एक त्रास,
शायद,
           एक प्रेम,
या सिर्फ 
            एक भ्रम ?

कई बार गम में भी, कम ही सही, जीने की एक वजह खोजते

कई बार गम में भी, कम ही सही,
जीने की एक वजह खोजते
और,
कई बार खो जाते खुशियों की
भीड़ में, खुद को ही खोजते-खोजते |


कई बार मकसद-विहीन
हो के भी लीन रहते
और,
कई बार पास रह के
भी मंजिल नहीं पाते |


कई बार अपनों के बीच
भी, अपने खो जाते 
और,
कई बार बेगानों से निकल
आते जन्मों के नाते |


कई बार बातों में भी
शुकून नहीं मिलता
और,
कई बार बीन कहे ही
मन हैं खिलता |


कई बार सब मिलके
भी कुछ नहीं मिलता
और,
कई बार सब खो के भी
हम क्या नहीं पाते !

Saturday, May 29, 2010

दर्द के बिना क्या ये जिंदगी अधूरी हैं?

दर्द के बिना क्या ये जिंदगी अधूरी हैं?
क्या ह्रदय-अवसाद का रिसना जरुरी हैं?
मातम मनाते रहे क्यूँ हर पल यहाँ,
क्या अविरत रोना हमारी मज़बूरी हैं?


विषाद ही मिला हैं अब तक चलते-चलते,
क्या संगिनी प्रियतम-प्रेरणा माधुरी हैं?
रिस गया हैं लहू जिस्म से सारा,
क्या प्राण-रस-बिन जिंदगी दुलारी हैं?


कंटकों के शर जो चुभ रहें हैं पाँव में
क्या तन मेरा हिम-स्थूल हिमाद्री हैं?
विस्मित हूँ, विरह-वेदना के घाव हरे हैं,
क्या नियति-नियोग, निश्चल-प्रेम पे भारी हैं?


पथरीले नयन, थके कदम, हतास मन
क्या यह विचिलित-व्यक्तित्व हमारी हैं!
जमे रक्त-संचार, जकड़ी नसें, मद्धम ह्रदय-गति 
क्या यह विकराल-काल यम की आरी हैं? 


यह क्या! अनायास ही बह चली
यह कैसी अमृतरस-कुसुम की बयारी हैं!
क्या मैं हूँ मरुस्थली-धरा पे या
हे देव, यह पावन-उपवन तुम्हारी हैं? 

Thursday, May 27, 2010

काफिले कई लगे, कारवां गुजरते गए

काफिले कई लगे,  
                     कारवां गुजरते गए 
महफिले कई सजी,
                     मेहेरबा निकलते गए 
सम्मा कई जली,
                     परवाने पिघते गए 
(रूप की) आंधियां कई चली,
                     दीवाने मचलते गए 


नदियाँ कई बही,
                    एक बूंद को तरसते रहे
सदियाँ कई बीती,
                   एक पल को लरसते रहे 

Wednesday, May 19, 2010

जंग के मैदान को देखा

जंग के मैदान को देखा, 
रक्तरंजित धरती देखी |


लाशों का ढ़ेर देखा, 
उनकी तन्हाई देखी |


ज़ख्म से बहते खून को देखा, 
खून से सनी मिट्टी देखी |


भयभीत चेहरों को देखा, 
दिल की खामोशी देखी |


नफरत और घृणा के आग को देखा, 
आग में झुलसे प्रेम को देखा |


सिपाहियों की सरफरोशी देखी, 
सन्नाटे की आगोशी देखी |


अपने भाइयों को मरते देखा, 
सीने के टुकड़े को लड़ते देखा |


जीत की ख़ुशी मानते देखा, 
हार के मातम को देखा |


जंग के मैदान को देखा, 
जंग के मैदान को देखा |

ये कविता मैंने २००१ या शायद २००२ में कभी लिखी थी | जो भाव इस कविता में नीहित हैं वो बीते हुए युगों में भी प्रासंगिक था, आज भी हैं और तब तक रहेगा जब तक जंग होते रहेंगे |
धन्यवाद

Wednesday, March 31, 2010

पिघलते हुए जलते मौम की लौ में

पिघलते हुए जलते मौम की लौ में
चमकता हुआ खुबसूरत तेरा चेहरा.
सरमाते हुए उगते चाँद की रौशनी में
गहराता हुआ इन घटाओं का पहरा.


थराते हुए सुर्ख होठों की ख़ामोशी में
गुम पड़े लफ़्ज़ों का संग, गहरा.
नम हुए खोजते आँखों की सरगोशी में
सोए पड़े एक ख्वाब का जागता सवेरा.


धड़कते हुए शांत दिल की धड़कन में
खोए किसी जज्बात का छुटता सहारा.
खींचे हुए परेशान भोंओं की शिहरण में
खोजता किसी डूबते विचारों का किनारा.

Friday, March 19, 2010

जानू ना जानू मैं...

जानू ना जानू मैं
कि
चाहू मैं चाहू क्या |

चलू जो चलू
इन
रास्तों पे,
जानू ना जानू मैं
ये
जाये तो जाये कहाँ |

खोजू जो खोजू मैं, पर
क्या
कहते जो कहते मंजिल
जिसे
पाऊँ तो पाऊँ कहाँ |

देखू तो देखू
क्या
दिखे जो वो चाहू ना |

कहूँ तो कहूँ
किस्से
वो खुदा क्यूँ मिले ना |

Thursday, March 11, 2010

गगन चुम्बी इमारतों के बीच से

गगन चुम्बी इमारतों के बीच से

जाती हुई एक सड़क पे

गाड़ियों की क़तर में
मैं बैठा किसी किनारे
देख रहा हूँ उन गाड़ियों में
बैठे लोगों को
शायद पहचानू किसी को|
नजरे मिलती हैं एक खालीपन से|
इस भीड़ में चलते हुई हम सब

अजनबी है|